नई दिल्ली: पर्यावरण संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट जगत को सख्त और स्पष्ट संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) को पर्यावरणीय दायित्वों से अलग नहीं किया जा सकता। यदि किसी कंपनी की गतिविधियों से पर्यावरण, वन्यजीव या संकटग्रस्त प्रजातियों को नुकसान पहुंचता है, तो वह जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने कहा कि कंपनियां केवल लाभ कमाने वाली इकाइयां नहीं हैं, बल्कि समाज और प्रकृति के प्रति उनकी संवैधानिक जिम्मेदारियां भी हैं। अदालत ने दो टूक कहा कि कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत सीएसआर कोई स्वैच्छिक पहल नहीं, बल्कि लागू करने योग्य कानूनी दायित्व है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जहां कॉरपोरेट परियोजनाओं के कारण प्राकृतिक आवास प्रभावित होते हैं या विलुप्तप्राय प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ता है, वहां ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ स्वतः लागू होगा। ऐसे मामलों में संरक्षण की जिम्मेदारी टाली नहीं जा सकती। कोर्ट ने कहा कि संकटग्रस्त प्रजातियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और सीएसआर फंड का उपयोग उनके संरक्षण में किया जाना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि सीएसआर को दान या परोपकार की तरह देखना गलत है। यह संविधान के तहत सौंपा गया दायित्व है, जिसका उद्देश्य केवल औपचारिकता निभाना नहीं, बल्कि वास्तविक और प्रभावी संरक्षण सुनिश्चित करना है।
इसके साथ ही अदालत ने राजस्थान और गुजरात में कार्यरत नवीकरणीय और गैर-नवीकरणीय ऊर्जा कंपनियों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के प्राकृतिक आवास में अतिथि की तरह हैं। उन्हें अपनी गतिविधियां इस प्रकार संचालित करनी होंगी कि पक्षी और उसके पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुंचे।
