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झूठे विवाह के वादे पर दुष्कर्म का आरोप, सुप्रीम कोर्ट ने कहा—सहमति वाले संबंधों में सोच-समझ जरूरी

झूठे विवाह के वादे पर दुष्कर्म का आरोप, सुप्रीम कोर्ट ने कहा—सहमति वाले संबंधों में सोच-समझ जरूरी

नई दिल्ली। Supreme Court of India ने सोमवार को झूठे विवाह के वादे पर दुष्कर्म के एक मामले की सुनवाई के दौरान अहम मौखिक टिप्पणियां कीं। अदालत ने कहा कि विवाह से पहले लड़का और लड़की एक-दूसरे के लिए अजनबी होते हैं, ऐसे में प्री-मैरिटल संबंधों को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए।

मामले की सुनवाई जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ कर रही थी। आरोपी ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) के जरिए जमानत की मांग की है। उस पर आरोप है कि उसने पहले से शादीशुदा होने के बावजूद शिकायतकर्ता को विवाह का झांसा दिया और शारीरिक संबंध बनाए। बाद में उसने जनवरी 2024 में पंजाब में दूसरी शादी भी कर ली।

अभियोजन के अनुसार, लगभग 30 वर्षीय महिला की मुलाकात 2022 में एक वैवाहिक वेबसाइट के जरिए आरोपी से हुई थी। आरोप है कि आरोपी ने शादी का भरोसा देकर दिल्ली और बाद में दुबई में कई बार शारीरिक संबंध बनाए। महिला का यह भी दावा है कि दुबई बुलाकर आरोपी ने बिना सहमति के निजी वीडियो रिकॉर्ड किए और विरोध करने पर उन्हें वायरल करने की धमकी दी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि यदि महिला विवाह को लेकर गंभीर थीं तो वह शादी से पहले दुबई क्यों गईं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में दोनों पक्षों को सतर्क रहना चाहिए। पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि जहां संबंध सहमति से बने हों, वहां हर मामले को ट्रायल और सजा तक ले जाना उचित नहीं हो सकता।

अदालत ने मामले को मध्यस्थता (मेडिएशन) के लिए भेजने का सुझाव दिया और संभावित समझौते की संभावना तलाशने के लिए सुनवाई को बुधवार तक स्थगित कर दिया।

गौरतलब है कि इससे पहले सत्र अदालत और Delhi High Court आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर चुके हैं। हाई कोर्ट ने 18 नवंबर 2025 को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि विवाह का वादा शुरुआत से ही कपटपूर्ण था, क्योंकि आरोपी पहले से विवाहित था। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि विवाह का वादा दुर्भावना से और बिना वास्तविक इरादे के किया गया हो तो ऐसी स्थिति में सहमति अमान्य मानी जा सकती है।

अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई में यह देखा जाएगा कि क्या पक्षकार आपसी सहमति से विवाद सुलझाने को तैयार हैं या मामला आगे कानूनी प्रक्रिया के तहत जारी रहेगा।

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