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भालू हमलों से उत्तराखंड में हड़कंप, 2000 से अधिक घटनाएँ दर्ज

भालू हमलों से उत्तराखंड में हड़कंप, 2000 से अधिक घटनाएँ दर्ज

देहरादून- उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भालुओं के हमलों में असामान्य रूप से बढ़ोतरी देखने को मिली है। पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह समस्या गंभीर रूप लेती जा रही है, क्योंकि अब तेंदुए और बाघ ही नहीं, बल्कि हिमालयी काले भालू भी लगातार लोगों पर हमला कर रहे हैं।

राज्य गठन के बाद से अब तक दो हजार से अधिक बार भालू हमले हो चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोग घायल और कई लोगों की जान गई है। हिमालयी काला भालू सामान्यतः 1500 से 3000 मीटर की ऊँचाई वाले इलाकों में पाया जाता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसकी आक्रामकता तेजी से बढ़ी है।

मौतों के आँकड़े बताते हैं कि स्थिति कितनी गंभीर होती जा रही है

2020: 10 लोगों की मौत

2021: 13 लोग भालू हमले में मारे गए

2022: 1 मौत

2023: कोई मौत दर्ज नहीं

2024: 3 लोगों की मौत

2025: अब तक 4 से अधिक लोगों की मौत

इसी तरह घायलों का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है।

2020: 99 घायल

2022: 57 घायल

2023: 53 घायल

2024: 65 घायल

2025: अब तक 44 लोग घायल

इंसानों के साथ-साथ गाय, भैंस और बकरियों जैसे मवेशी भी भालुओं के हमलों का शिकार बने हैं। पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्रों में ऐसी घटनाएँ सबसे ज्यादा हुई हैं।

आखिर भालू क्यों हो रहे हैं अधिक आक्रामक?

पर्यावरणविद् एस.पी. सती के अनुसार इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं:

1. जलवायु परिवर्तन और शीतनिद्रा का टूटना

हिमालयी भालू सामान्यतः सर्दियों में हाइबरनेशन में चले जाते हैं, लेकिन तापमान बढ़ने और कम बर्फबारी के कारण अब वे पूरी तरह शीतनिद्रा में नहीं जा पा रहे। इससे उनके व्यवहार में बदलाव आया है और वे सर्दियों में भी भोजन की तलाश में सक्रिय रहते हैं। इसी दौरान इंसानों से उनका सामना अधिक हो रहा है।

2. भोजन की कमी

पहाड़ों में पहले भालू खेतों में मिलने वाला मंडुवा (कोदरा) खाते थे, लेकिन खेती छोड़ने और खेत उजाड़ होने के कारण यह भोजन स्रोत लगभग खत्म हो गया है।
भालू शाकाहारी और मांसाहारी दोनों होते हैं, लेकिन शाकाहारी भोजन की कम उपलब्धता उन्हें अधिक उग्र बना रही है।

3. भंगोरा फल का कम होना

1000 से 3000 मीटर की ऊँचाई पर मिलने वाला भंगोरा फल भालुओं का पसंदीदा भोजन है, लेकिन चीड़ के पेड़ों के तेजी से फैलाव के कारण यह फल अब बहुत कम हो गया है। भोजन की कमी उन्हें इंसानी बस्तियों की ओर धकेल रही है।

4. कस्बों के पास फैला कचरा

सबसे बड़ा कारण इंसानी लापरवाही भी है। कस्बों और गांवों के पास खुले में फेंका जाने वाला कचरा—जिसमें सब्जियों के अवशेष, भोजन और मांसाहारी दुकानों का बचा हुआ कूड़ा शामिल होता है—भालुओं को लुभाता है।
यहाँ आसानी से भोजन मिलने से भालू आबादी वाले क्षेत्रों के आसपास ही घूमने लगे हैं, जिससे मानव–वन्यजीव संघर्ष और बढ़ गया है।

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