नई दिल्ली: दिल्ली की अदालतों से जुड़े तीन अलग-अलग मामलों में अहम कानूनी फैसले सामने आए हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट से जुड़े एक मामले में 19 वर्षीय युवक को नियमित जमानत देते हुए कहा कि यह कानून नाबालिगों को यौन शोषण से बचाने के लिए है, न कि सहमति से बने युवाओं के रिश्तों को अपराध मानने के लिए। न्यायमूर्ति विकास महाजन की एकल पीठ ने माना कि आरोपी और पीड़िता के बीच उम्र का अंतर बहुत अधिक नहीं था और दोनों के संबंध स्वैच्छिक थे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लंबी पूर्व-ट्रायल हिरासत दंड का रूप नहीं ले सकती और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को कानून के उद्देश्यों के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने जमानत के साथ शर्तें भी लगाईं और साफ किया कि ये टिप्पणियां केवल जमानत तक सीमित हैं।
वहीं, रोहिणी कोर्ट ने एक जघन्य मामले में 11 वर्षीय बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि आरोपी ने पिता-पुत्री के पवित्र रिश्ते को शर्मनाक तरीके से तोड़ा है और ऐसे अपराध में किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती। कोर्ट ने दोषी को समाज के लिए खतरा बताते हुए पीड़िता को उचित मुआवजा देने के निर्देश भी दिए।
इसके अलावा, कड़कड़डूमा कोर्ट ने यौन उत्पीड़न और घर में घुसपैठ के एक मामले में आरोपी को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। गवाहों के बयानों में विरोधाभास, अहम प्रत्यक्षदर्शी की गैर-मौजूदगी और पक्षों के बीच पहले से चली आ रही रंजिश को देखते हुए आरोपी को संदेह का लाभ दिया गया।
