अहमदाबाद: गुजरात हाई कोर्ट ने वडोदरा की एक नाबालिग रेप पीड़िता द्वारा 26 सप्ताह के भ्रूण का गर्भपात कराने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने यह फैसला मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद सुनाया।
मामले में नाबालिग ने अदालत में याचिका दायर कर कहा था कि वह इस गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने वडोदरा के एसएसजी अस्पताल के मेडिकल बोर्ड को पीड़िता की स्वास्थ्य स्थिति की जांच कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था। अदालत के आदेश के बाद 11 मार्च को नाबालिग की चिकित्सकीय जांच की गई और मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट अदालत में पेश की।
रिपोर्ट में कहा गया कि गर्भावस्था के इस चरण में गर्भपात कराना नाबालिग के लिए चिकित्सकीय रूप से अधिक जोखिम भरा हो सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, इस समय गर्भपात कराने की तुलना में बच्चे को जन्म देना अपेक्षाकृत सुरक्षित माना गया है। मेडिकल बोर्ड ने यह भी आशंका जताई कि यदि बच्चा समय से पहले जन्म लेता है तो उसे सांस लेने में दिक्कत या रक्तस्राव जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जिसके चलते वेंटिलेटर सहायता की जरूरत पड़ सकती है।
मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर अदालत ने गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया। साथ ही नाबालिग के स्वास्थ्य, सुरक्षा और भविष्य को ध्यान में रखते हुए कई निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि अस्पताल नाबालिग की डिलीवरी के लिए पूरी चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराए। बच्चे के जन्म के बाद नाबालिग की इच्छा के अनुसार उसे किसी अधिकृत गोद लेने वाली एजेंसी को सौंपने की प्रक्रिया भी पूरी की जा सकती है।
इसके अलावा अदालत ने कहा कि यदि नाबालिग अपने परिवार के साथ नहीं रहना चाहती तो उसे महिला आश्रय गृह में सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जाए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि नाबालिग की डिलीवरी का पूरा खर्च राज्य सरकार उठाएगी और बच्चे के जन्म के बाद छह महीने तक मां और बच्चे के इलाज व देखभाल का खर्च भी सरकार वहन करेगी।
अदालत ने नाबालिग के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसे व्यावसायिक प्रशिक्षण देने और आगे की पढ़ाई की व्यवस्था करने का निर्देश जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को दिया है। साथ ही DLSA के सचिव को पूरे मामले की निगरानी करने को कहा गया है ताकि अदालत के आदेशों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित किया जा सके।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता भौमिक शाह ने अदालत को नाबालिग की परिस्थितियों और उसकी इच्छा के बारे में अवगत कराया था। हालांकि अदालत ने चिकित्सकीय जोखिमों को देखते हुए मेडिकल बोर्ड की राय को आधार बनाकर निर्णय सुनाया।
