नई दिल्ली- देश के अलग-अलग राज्यों से प्राइवेट अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल खड़े करने वाले मामले सामने आए हैं। लखनऊ से लेकर ग्रेटर नोएडा, मुंगेर, रांची और भोपाल तक की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि कैसे इलाज के नाम पर मरीजों और उनके परिवारों की मजबूरी को मुनाफे का जरिया बनाया जा रहा है। आरोप हैं कि कहीं गलत इलाज से मरीज अपंग हो गए, तो कहीं मौत के बाद भी शव सौंपने के लिए पैसे मांगे गए।
लखनऊ: गलत सर्जरी के बाद अपंग हुआ मरीज, अस्पताल सील
लखनऊ निवासी 35 वर्षीय नीरज मिश्रा बैटरी रिक्शा हादसे में घायल हुए थे। इलाज के लिए उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां कथित तौर पर गलत सर्जरी और लापरवाही से उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। इलाज के दौरान उनसे बार-बार पैसे जमा कराए गए और अलग-अलग अस्पतालों के नाम पर भुगतान कराया गया।
बाद में नीरज को कई बार ऑपरेशन से गुजरना पड़ा, जिससे वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गए और उन पर करीब 21 लाख रुपये का कर्ज चढ़ गया। जांच में लखनऊ परिवार कल्याण बोर्ड ने अस्पताल प्रबंधन को दोषी माना, जिसके बाद सीएमओ ने अस्पताल का पंजीकरण रद्द कर दिया और इलाज पर रोक लगा दी गई।
ग्रेटर नोएडा: मौत के बाद भी नहीं मिला शव
ग्रेटर नोएडा के एक निजी अस्पताल में फिरोजाबाद निवासी जयदेव सिंह को ब्रेन हेमरेज के बाद भर्ती कराया गया। परिजनों का आरोप है कि इलाज के नाम पर करीब 30 लाख रुपये वसूले गए, लेकिन मरीज की जान नहीं बच सकी।
मौत के बाद अस्पताल प्रबंधन ने बकाया राशि का हवाला देते हुए शव देने से इनकार कर दिया। पुलिस हस्तक्षेप के कई घंटे बाद जाकर शव परिजनों को सौंपा गया। अस्पताल प्रबंधन ने आरोपों को नकारते हुए कहा कि इलाज और खर्च की जानकारी परिवार को दी जाती रही।
मुंगेर: बिना सहमति पैर काटने का आरोप
बिहार के मुंगेर जिले में सड़क हादसे में घायल टिंकू साहू को एक निजी अस्पताल ले जाया गया, जहां परिजनों की अनुमति के बिना उनका पैर काटने का आरोप लगा है। परिवार का दावा है कि इलाज के नाम पर लाखों रुपये वसूले गए और पैसे न देने पर परिजनों को अस्पताल में रोके रखा गया।
मामला जिला प्रशासन तक पहुंचा, जिसके बाद जांच के आदेश दिए गए और अस्पताल को नोटिस जारी किया गया।
रांची: बीमा होने पर बढ़ा इलाज का खर्च!
रांची के एक बड़े निजी अस्पताल में सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी बीआर तिवारी की मौत के बाद परिजनों ने इलाज में गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए। परिवार का कहना है कि बीमा होने की जानकारी मिलते ही उन्हें आईसीयू में भर्ती किया गया और कुछ ही दिनों में लाखों रुपये का बिल थमा दिया गया।
आरोप है कि आईसीयू में तकनीकी चूक के कारण संक्रमण फैला, जिससे मरीज की मौत हुई। अस्पताल प्रबंधन की ओर से इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
भोपाल: मामूली चोट, आईसीयू और मौत
भोपाल के एक निजी अस्पताल में मामूली पैर की चोट लेकर पहुंची 24 वर्षीय युवती की इलाज के दौरान मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि बिना जरूरत आईसीयू में भर्ती किया गया और पैसे की लगातार मांग होती रही। मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है, जबकि अस्पताल प्रबंधन आरोपों को बेबुनियाद बता रहा है।
जवाबदेही पर बड़ा सवाल
इन सभी मामलों ने प्राइवेट अस्पतालों की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी है, तो दूसरी ओर निजी अस्पतालों पर मुनाफाखोरी और लापरवाही के आरोप लग रहे हैं। सरकार ने नियम तो बनाए हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर सख्त कार्रवाई के बिना मरीजों को राहत मिलती नजर नहीं आ रही।
