नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 12 साल से कोमा में रह रहे 31 वर्षीय युवक की निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति देते हुए उसके कृत्रिम जीवन-रक्षक उपकरण हटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि मरीज की गरिमा बनाए रखते हुए उपचार बंद करने की प्रक्रिया नियोजित तरीके से पूरी की जाए।
उपशामक देखभाल में शिफ्ट करने के निर्देश
न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और केवी विश्वनाथन की पीठ ने एम्स को निर्देश दिया कि युवक को पैलियेटिव केयर यूनिट में भर्ती किया जाए, जहां जीवन-रक्षक मशीनों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा सके। अदालत ने कहा कि अस्पताल यह सुनिश्चित करे कि मरीज को कोई अतिरिक्त कष्ट न पहुंचे।
कोर्ट ने माता-पिता से मुलाकात सुनिश्चित कराई
इससे पहले पीठ ने युवक की उस इच्छा पर संज्ञान लिया था, जिसमें उसने अपने माता-पिता से मिलने की बात कही थी। मुलाकात के बाद कोर्ट ने इलाज रोकने की अनुमति से जुड़े दस्तावेजों और मेडिकल निष्कर्षों पर विचार किया।
द्वितीयक मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट ‘दुखद’
सुप्रीम कोर्ट ने एम्स-दिल्ली के डॉक्टरों द्वारा तैयार की गई विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट का अवलोकन किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि 12 वर्ष से अधिक समय से कोमा में पड़े मरीज की स्थिति बेहद दयनीय है और सुधार की कोई संभावना नहीं बची है।
रिपोर्ट के अनुसार, प्राथमिक मेडिकल बोर्ड ने भी स्पष्ट किया था कि मरीज के ठीक होने की संभावना लगभग नगण्य है।
सुप्रीम कोर्ट के 2023 के दिशानिर्देशों के तहत, ऐसे मामलों में उपचार हटाने से पहले दो स्तर के मेडिकल बोर्ड की राय अनिवार्य है।
