नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने ओबीसी के क्रीमी लेयर से जुड़े एक अहम मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर में शामिल करने का फैसला केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया में अभिभावकों के पद और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
यह फैसला जस्टिस P. S. Narasimha और जस्टिस R. Mahadevan की दो सदस्यीय पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने केंद्र सरकार की उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिनमें हाई कोर्ट के फैसलों को चुनौती दी गई थी।
दरअसल यह मामला उन अभ्यर्थियों से जुड़ा था जिन्होंने UPSC Civil Services Examination पास कर ली थी, लेकिन सरकार ने उनके माता-पिता की सैलरी को आधार बनाकर उन्हें क्रीमी लेयर में शामिल कर दिया था। इसके कारण उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया और नियुक्ति भी रोक दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अधिकारियों ने उम्मीदवारों को आरक्षण से बाहर करने के लिए गलत मानदंड अपनाया। अदालत के अनुसार किसी अभ्यर्थी की क्रीमी लेयर स्थिति तय करते समय केवल आय को आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र के आधार पर मुख्य नीति में बदलाव नहीं कर सकती। अदालत ने 1993 के उस सरकारी आदेश का हवाला दिया, जो Indra Sawhney Case के बाद जारी किया गया था। इस आदेश में स्पष्ट किया गया था कि क्रीमी लेयर तय करने में माता-पिता का पद, जैसे ग्रुप ए या ग्रुप बी अधिकारी होना, महत्वपूर्ण आधार होता है।
अदालत ने यह भी माना कि सरकारी कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों के बीच अलग-अलग मानदंड लागू करना समानता के अधिकार के खिलाफ है। यदि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को पद के आधार पर छूट मिलती है, तो पीएसयू या बैंक कर्मचारियों के बच्चों को केवल सैलरी के आधार पर आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह छह महीने के भीतर प्रभावित उम्मीदवारों के मामलों की दोबारा समीक्षा करे। साथ ही जरूरत पड़ने पर इन उम्मीदवारों को नियुक्ति देने के लिए अतिरिक्त पद भी सृजित किए जा सकते हैं।
