नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म से जुड़े दो मामलों में अलग-अलग निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि सहमति से बने संबंधों को बाद में अपराध नहीं ठहराया जा सकता, जबकि नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में अदालत ने अग्रिम जमानत से इंकार कर दिया।
पहले मामले में, न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने आरोपी कुंदन सिंह नेगी को निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए कहा कि पीड़िता और आरोपी के बीच संबंध सहमति पर आधारित थे। अदालत ने पाया कि महिला घटना के बाद भी आरोपी से मिलती रही, उसके साथ रही और जेल में भी मुलाकात की। इसके आधार पर अदालत ने माना कि यह “सहमति टूटने के बाद अपराध का रंग देने” जैसा मामला है।
पीड़िता ने नवंबर 2016 में शिकायत दर्ज कराई थी कि आरोपी ने उसका वीडियो बनाकर धमकाया और दुष्कर्म किया। हालांकि, जांच और सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि दोनों के बीच पहले से जान-पहचान थी, और कई मुलाकातें सहमति से हुईं। निचली अदालत ने 2017 में सात साल की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया।
दूसरे मामले में, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने पॉक्सो अधिनियम के तहत दुष्कर्म के आरोपी को अग्रिम जमानत देने से इंकार करते हुए कहा कि “दोस्ती किसी को अपराध का अधिकार नहीं देती।” अदालत ने कहा कि नाबालिग के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न और मारपीट को “सहमति से संबंध” नहीं कहा जा सकता।
यह मामला संगम विहार थाने में दर्ज हुआ था, जिसमें पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने सोशल मीडिया के माध्यम से दोस्ती की और मिलने के बहाने अपने दोस्त के घर ले जाकर कई बार यौन शोषण किया।
