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बांग्लादेश में हसीना को मौत की सजा: एमनेस्टी का विरोध, संयुक्त राष्ट्र ने जताई गहरी चिंता

बांग्लादेश में हसीना को मौत की सजा: एमनेस्टी का विरोध, संयुक्त राष्ट्र ने जताई गहरी चिंता

ढाका: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र को गंभीर रूप से चिंतित कर दिया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल और यूएनएचआरसी दोनों ने इस फैसले की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह प्रक्रिया न तो पारदर्शी थी और न ही अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मानकों पर खरी उतरती है।

मानवाधिकार संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बांग्लादेश में शेख हसीना को मौत की सजा सुनाए जाने के फैसले का कड़ा विरोध किया है। ब्रिटेन स्थित इस संस्था ने कहा कि हसीना और उनके कार्यकाल में गृह मंत्री रहे असदुज्जमां खान के खिलाफ चली कार्यवाही “निष्पक्ष” और “न्यायसंगत” नहीं थी।

सोमवार को बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने दोनों को 2024 के कथित विद्रोह के दौरान मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी पाते हुए फांसी की सजा सुनाई थी।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने फैसले के कुछ ही घंटों बाद जारी बयान में स्पष्ट कहा— “शेख हसीना को मौत की सजा सुनाने से 2024 के नरसंहार पीड़ितों को न्याय नहीं मिल सकता। यह प्रक्रिया निष्पक्ष सुनवाई के बुनियादी मानकों पर खरी नहीं उतरती।”

संस्था की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने कहा कि जुलाई-अगस्त 2024 में छात्रों के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों के दौरान हुए मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए दोषियों की जांच और निष्पक्ष ट्रायल जरूरी है, लेकिन इस मामले में न्यायाधिकरण की कार्यवाही में कई गंभीर खामियां दिखाई देती हैं।

एमनेस्टी ने जिस तेज़ी से यह सुनवाई पूरी की गई, उस पर भी सवाल उठाए। संस्था के अनुसार, शेख हसीना की अनुपस्थिति में ट्रायल होना और अदालत द्वारा नियुक्त वकील को बचाव तैयार करने के लिए पर्याप्त समय न मिलना, पूरे मामले को संदेहास्पद बनाता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, बचाव पक्ष को कई ऐसे सबूतों पर जिरह करने की अनुमति भी नहीं दी गई, जिन्हें विरोधाभासी माना गया था। एमनेस्टी ने इसे सीधे तौर पर निष्पक्ष सुनवाई का उल्लंघन बताया और कहा कि मौत की सजा मानवाधिकार मानकों के विरुद्ध है।

संयुक्त राष्ट्र ने भी उठाई चिंता

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने भी इस फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। संस्था की प्रवक्ता रवीना शमदासानी ने कहा कि यह फैसला उन पीड़ितों के लिए महत्वपूर्ण क्षण है, जिन्हें 2024 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान दमन का सामना करना पड़ा था।

उन्होंने कहा—“हम मुकदमे की पूरी प्रक्रिया से अवगत नहीं थे, लेकिन जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए निष्पक्ष ट्रायल और उचित प्रक्रिया का पालन अत्यंत आवश्यक है।”

यूएन ने विशेष रूप से इस बात को रेखांकित किया कि मामला अनुपस्थिति में ट्रायल और मौत की सजा दोनों से जुड़ा था, इसलिए अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

संयुक्त राष्ट्र ने अपनी पुरानी नीति दोहराते हुए कहा कि वह सजा-ए-मौत का हर परिस्थिति में विरोध करता है और बांग्लादेश से भी इसका पुनर्विचार करने की अपील करता है।

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