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दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय साइबर गिरोह का भंडाफोड़, चीन से चलता था फर्जी निवेश का खेल

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दिल्ली- दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने एक बड़े साइबर ठगी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया है, जिसकी संचालन श्रृंखला चीन से नियंत्रित हो रही थी। यह नेटवर्क ऑनलाइन निवेश के नाम पर लोगों से लाखों रुपये ऐंठता था। इसी गिरोह से जुड़े दिल्ली निवासी लक्ष्य और फैजाबाद के शुभम सिंह को गिरफ्तार किया गया है। जांच में पता चला कि आरोपियों ने दिल्ली में रहने वाले एक बुजुर्ग को 33 लाख रुपये से ज्यादा का चूना लगाया था।

फर्जी कंपनी के जरिये रकम की लेयरिंग

अपराध शाखा के डीसीपी आदित्य गौतम के अनुसार, ठगी से प्राप्त धनराशि को ‘बेलक्रेस्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की शेल कंपनी के खातों के माध्यम से कई चरणों में घुमाया गया। यह कंपनी कागज़ों पर लक्ष्य और शुभम के नाम पर रजिस्टर्ड थी। पुलिस ने इन खातों में लगभग 10.38 लाख रुपये के लेनदेन का पता लगाया।

19 नवंबर को लक्ष्य को दिल्ली से पकड़ा गया। पूछताछ में उसने खुलासा किया कि कुछ हजार रुपये महीने की कथित तनख्वाह पर उसने नकली कंपनी बनवाई, बैंक खाते खुलवाए और अपना मोबाइल नंबर व बैंक किट अपने साथियों को सौंप दिया था।

मुख्य आरोपी गिरफ्तार, विदेशी कनेक्शन उजागर

लक्ष्य की गिरफ्तारी की खबर मिलते ही मुख्य संचालक शुभम सिंह छिप गया। लगातार दबिशों के बाद पुलिस ने उसे भी दबोच लिया। उसके पास से लैपटॉप, मोबाइल फोन, चेकबुक और डेबिट कार्ड की एक खेप बरामद हुई।

जांचकर्ताओं को पता चला कि शुभम इस ठगी मॉड्यूल को चीन में बैठे अपने ’हैंडलर’ के निर्देश पर संचालित कर रहा था। विदेशी नेटवर्क उसे तीसरी और चौथी लेयर के बैंक खातों की जानकारी उपलब्ध कराते थे, जिनका उपयोग ठगी की रकम को आगे भेजने में किया जाता था।

लक्ष्य की गिरफ्तारी के बाद शुभम ने सबूत मिटाने की कोशिश करते हुए कंपनी के चेकबुक नष्ट कर दिए और इस्तेमाल किए गए सिमकार्ड भी तोड़ दिए, जिन्हें बाद में पुलिस ने बरामद कर लिया।

क्रिप्टो के माध्यम से होता था अंतिम रूप से धन का हेरफेर

शुभम के मुताबिक, वह चीन से संचालित ‘कूल-पे’ नेटवर्क से जुड़ा हुआ था। ठगी की रकम पहले कूल-पे द्वारा पहले लेयर वाले खातों से उठाई जाती और बाद में बेलक्रेस्ट के खाते में पहुंचाई जाती थी। इसके बाद धन को अलग-अलग खातों में घुमाकर क्रिप्टोकरेंसी में बदल दिया जाता था। अंतिम चरण में वही क्रिप्टोकरेंसी फिर से कूल-पे को बेच दी जाती थी, जिससे गिरोह अपने निशान मिटा देता था।

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