नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट ने यौन उत्पीड़न की शिकायतों पर एक अहम फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी महिला कर्मचारी द्वारा दर्ज शिकायत पर उसी के विभाग में गठित आंतरिक शिकायत समिति (ICC) कार्रवाई कर सकती है, भले ही आरोपित कर्मचारी किसी अलग विभाग से संबद्ध क्यों न हो। अदालत ने कहा कि पॉश (POSH) अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं को अधिकतम सुरक्षा प्रदान करना है, इसलिए इसकी व्याख्या सीमित दायरे में नहीं की जानी चाहिए।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कहा कि धारा 11 में प्रयुक्त शब्द “जहां प्रतिवादी कर्मचारी है” का मतलब यह नहीं कि शिकायत केवल उसी विभाग की ICC ही सुने, जहां आरोपी तैनात है। ऐसी संकीर्ण व्याख्या से महिला कर्मचारी को अनावश्यक मानसिक दबाव और प्रक्रियागत मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
अदालत ने कहा कि यदि पीड़िता अपने विभाग की ICC के सामने शिकायत रखती है, तो आरोपी के विभाग के अधिकारी और नियोक्ता पॉश अधिनियम की धारा 19(एफ) के तहत अनिवार्य रूप से सहयोग करने के लिए बाध्य होंगे। इसमें दस्तावेज, जानकारी और जांच से जुड़ी अन्य सहायता उपलब्ध कराना शामिल है।
IRS अधिकारी की याचिका खारिज — 2023 के मामले में सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टता
यह फैसला उस समय आया जब शीर्ष अदालत भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के 2010 बैच के एक अधिकारी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने अपने खिलाफ जारी ICC नोटिस को चुनौती दी थी।
उन पर आरोप था कि 15 मई 2023 को उन्होंने एक 2004 बैच की IAS अधिकारी के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न किया। पीड़िता खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग में संयुक्त सचिव के पद पर कार्यरत थीं और उन्होंने पॉश अधिनियम के तहत शिकायत अपने ही विभाग की ICC के सामने दर्ज कराई थी।
IRS अधिकारी की याचिका पहले CAT (केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण) में खारिज हुई, फिर दिल्ली हाईकोर्ट ने भी CAT के फैसले को सही ठहराया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने भी इस चुनौती को अस्वीकार करते हुए कहा कि ICC की कार्रवाई पूरी तरह वैध है और कानून के अनुरूप है।
