नई दिल्ली: देशभर में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुपालन में पाई जा रही असमानता पर भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मौजूदा क्रियान्वयन की खामियों के बीच वर्तमान पीढ़ी आगे के विधायी सुधारों का इंतजार नहीं कर सकती।
न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार संविधान के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। यदि नगर निकाय ठोस कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन में विफल रहते हैं, तो इसका सीधा प्रभाव सार्वजनिक स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।
अदालत ने 1 अप्रैल से लागू होने जा रहे ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2026 के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्यों को आवश्यक तंत्र विकसित करने के निर्देश दिए। पीठ ने कहा कि जब वैश्विक मंच पर भारत तकनीकी और औद्योगिक प्रगति के लिए पहचाना जा रहा है, तब स्वच्छता और पर्यावरणीय मानकों के पालन में कोई ढिलाई स्वीकार्य नहीं हो सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि स्थानीय निकायों को जवाबदेही के दायरे में लाने और कचरा प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि नियमों का पालन केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रभावी रूप से लागू होना चाहिए।
