नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने देश में बढ़ते मुकदमों और न्यायिक देरी पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि अदालतों में दायर होने वाले कई मामले वास्तविक न्याय की जरूरत से ज्यादा, प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के उद्देश्य से लाए जा रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय प्रणाली को बाधित करने वाले ऐसे प्रयासों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का मकसद केवल गंभीर और वास्तविक विवादों का समाधान करना है। बेबुनियाद या बार-बार दायर किए जाने वाले मामलों से न सिर्फ अदालतों का समय बर्बाद होता है, बल्कि अन्य मामलों में न्याय मिलने में भी देरी होती है।
पीठ ने यह भी कहा कि यदि कोई पक्ष जानबूझकर निरर्थक या परेशान करने वाले मुकदमे दायर करता है, तो अदालत ऐसे मामलों को खारिज करने के साथ जुर्माना भी लगा सकती है। साथ ही, एक ही विवाद को अलग-अलग तरीकों से बार-बार उठाने की प्रवृत्ति को भी न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ बताया गया।
देश में लंबित मामलों की संख्या को लेकर भी अदालत ने चिंता जताई। वर्तमान में देशभर में करीब 5.5 करोड़ मामले लंबित हैं, जिनमें से अधिकांश निचली अदालतों में हैं। वहीं, सर्वोच्च न्यायालय में भी कई जनहित याचिकाएं वर्षों से लंबित पड़ी हैं, जिससे न्याय प्रक्रिया की गति पर असर पड़ रहा है।
यह टिप्पणी हैदराबाद के हिमायत नगर में स्थित एक संपत्ति विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आई। अदालत ने सिविल अपील को खारिज करते हुए Andhra Pradesh High Court के फैसले को बरकरार रखा, हालांकि उसके कुछ तर्कों से आंशिक असहमति भी जताई।
