रुद्रप्रयाग/गोपेश्वर: उत्तराखंड के गढ़वाल में स्थित ‘तृतीय केदार’ बाबा तुंगनाथ का पवित्र धाम और खूबसूरत चोपता घाटी इस समय गंभीर पर्यावरणीय संकट से जूझ रहे हैं। हर साल बर्फबारी और हिमालय की खूबसूरत वादियों का दीदार करने आने वाले लाखों पर्यटकों की लापरवाही के कारण इस इको-सेंसिटिव जोन की प्राकृतिक सुंदरता और जैव-विविधता अब दम तोड़ रही है। बुग्यालों (घास के मैदानों) में चारों तरफ बिखरा प्लास्टिक कचरा, कांच की बोतलें और गंदगी इस स्वर्ग जैसी जगह को बदसूरत बना रहे हैं।
वन्यजीव अभयारण्य होने के बावजूद चोपता घाटी में थार, रेड फॉक्स और उत्तराखंड के राज्य पक्षी ‘हिमालयन मोनाल’ का अस्तित्व खतरे में है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, पर्यटकों द्वारा फैलाए गए कचरे के कारण अब यहाँ जंगली जानवर और पक्षी दूषित खाना खाने को मजबूर हैं। बर्ड फोटोग्राफर राजू पुसोला ने चिंता जताते हुए बताया कि उन्होंने खुद बारिश के दौरान मोनाल पक्षी को प्लास्टिक के पैकेट से ‘कुरकुरे’ खाते देखा है, जो उनकी सेहत और प्रजनन क्षमता के लिए बेहद घातक है। इसके अलावा, यहाँ ‘बीयर बॉटल टूरिज्म’ और बढ़ते कचरे के कारण बंदरों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई है, जो मोनाल और तीतर जैसे पक्षियों के घोंसले नष्ट कर रहे हैं।
एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आनंद कुमार और राजीव लोचन के एक हालिया शोध में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शोध के अनुसार, तुंगनाथ और चोपता घाटी में गाड़ियों के हॉर्न, पर्यटकों के शोर और हेलीकॉप्टरों की गूंज के कारण मोनाल पक्षी आपस में संवाद नहीं कर पा रहे हैं। साथी को आकर्षित करने के लिए उन्हें बहुत तेज आवाज लगानी पड़ती है, जिससे उनकी सेहत गिर रही है। इस शोर का सीधा असर उनके अंडे देने और सेने (इनक्यूबेशन) के चक्र पर पड़ रहा है, जिससे उनके चूजों का बचना मुश्किल हो रहा है।
तीर्थ पुरोहित रेवाधर मैथानी ने बताया कि हर साल करीब 5 से 6 लाख पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं। कई सैलानी तय रास्तों को छोड़कर मुलायम बुग्यालों पर चलते हैं, जिससे घास नष्ट हो रही है और मिट्टी का कटाव (सोल इरोजन) बढ़ रहा है। यही नहीं, घास के मैदानों में बने अस्थायी नीले टेंट वाले शौचालयों का गंदा पानी रिसकर प्राकृतिक जल स्रोतों में मिल रहा है, जिससे पीने का पानी भी दूषित हो चुका है। तेज हवाओं के कारण प्लास्टिक का केमिकल मिट्टी में मिल रहा है, जिससे पेड़-पौधों की ग्रोथ रुक गई है।
पद्मश्री से सम्मानित मशहूर पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी का कहना है कि अब सिर्फ डस्टबिन लगाने से काम नहीं चलेगा। सरकार को एक ऐसी सख्त नियंत्रण प्रणाली बनानी होगी, जिससे पर्यटक ट्रेक पर प्लास्टिक लेकर ही न जा सकें। यात्रियों को जरूरत का सामान ट्रेक शुरू होने से पहले ही इको-फ्रेंडली पैकेट में दिया जाना चाहिए। जब तक पर्यटकों में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और स्थानीय लोगों में जागरूकता नहीं आएगी, तब तक हिमालय के इन संवेदनशील क्षेत्रों को बचाना नामुमकिन होगा।