नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या के एक गंभीर मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसी कुरीतियों के खिलाफ न्यायपालिका किसी भी तरह की नरमी नहीं बरतेगी। शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट द्वारा आरोपी पति को दी गई जमानत को रद्द करते हुए कहा कि केवल जेल में बिताए गए समय के आधार पर राहत देना उचित नहीं है।
यह मामला बिहार के गोपालपुर थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां एक महिला की शादी के डेढ़ साल के भीतर ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। मृतका की मां ने आरोप लगाया कि शादी के समय भारी नकद राशि और जेवर देने के बावजूद ससुराल पक्ष की मांगें खत्म नहीं हुईं। पति और उसके परिवार द्वारा लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई शामिल थे, ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर विशेष ध्यान दिया। रिपोर्ट में महिला के शरीर पर गंभीर चोटों का उल्लेख किया गया, जिससे स्पष्ट हुआ कि मौत सामान्य नहीं थी।
अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध अहम साक्ष्यों को नजरअंदाज करते हुए जल्दबाजी में फैसला दिया, जो न्यायिक दृष्टि से उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यदि दहेज प्रताड़ना के कारण महिला आत्महत्या भी करती है, तो वह भी कानून के तहत दहेज हत्या की श्रेणी में आएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी पति को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। साथ ही, निचली अदालत को आदेश दिया गया है कि मामले की सुनवाई छह महीने के भीतर प्राथमिकता के आधार पर पूरी की जाए।
