नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के चर्चित प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड में दोषी संतोष कुमार सिंह की परोल बढ़ाने की मांग पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले से जुड़ा मुख्य मुद्दा पहले से ही दिल्ली हाईकोर्ट में लंबित है, इसलिए फिलहाल हस्तक्षेप उचित नहीं होगा।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 18 मई को हाईकोर्ट में निर्धारित है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने संतोष सिंह को यह छूट दी कि वे हाईकोर्ट में जल्द सुनवाई के लिए अनुरोध कर सकते हैं।
पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि घटना 23 जनवरी 1996 की है और दोषी लगभग 31 वर्षों से जेल में है, जिसमें रिमिशन की अवधि भी शामिल है। ऐसे में यदि शीघ्र सुनवाई की मांग की जाती है, तो हाईकोर्ट मामले के तथ्यों के आधार पर विचार कर सकता है।
सुनवाई के दौरान संतोष सिंह के वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट द्वारा आत्मसमर्पण का निर्देश सख्त है, जबकि वह वर्तमान में ओपन जेल में सजा काट रहे हैं और उन्हें प्रतिदिन काम के लिए बाहर जाने की अनुमति है।
इससे पहले 19 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि समयपूर्व रिहाई की याचिका पर विचार तभी होगा जब संतोष सिंह आत्मसमर्पण करेंगे। इस फैसले का प्रियदर्शिनी मट्टू के परिवार ने समर्थन किया था और कहा था कि सजा में ढील नहीं दी जानी चाहिए।
उल्लेखनीय है कि 1996 में प्रियदर्शिनी मट्टू के साथ दुष्कर्म के बाद उनकी हत्या कर दी गई थी। 1999 में निचली अदालत ने संतोष सिंह को बरी कर दिया था, लेकिन 2006 में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में सजा को उम्रकैद में बदल दिया।
